Monday, December 1, 2008

कोंडम माने समझदारी

कोंडम माने समझदारी


और ये समझदारी किन को मिलनी चाहिए ?


या यूँ कहें किस उम्र से मिलनी चाहिए ?


एक ७ से १४ साल तक के बच्चे को क्या जरूरी है की उसे सम्भोग के दौरान इस्तेमाल होने वाले इस वस्तु को जाने ?


क्या आपने कभी कोंडम का पॉकेट पर छापी तस्वीरें देखी है?


ये फोटोग्राफ्स ऐड्स रोकने में कसे मददगार है मुझे समझ नही आता।
इन प्रश्नों से एसा आप को लगेगा कि लो आगया एक और समाज का ठेकेदार, Moral Policing करने।
लेकीन मेरे बंधू जरा गौर से सोचना ।





Friday, November 28, 2008

देश की chinta

आप को देश की चिंता खाए जा रही है
क्यों कि आप के हाथ में कुछ नही है ।


और
जिसके हाथ में साब कुछ है
वो देश खाए जा रहा है ।

देश की चिंता

Tuesday, November 4, 2008

एक थे कुंबले


अनिल कुंबले............. लंबे कद काठी के........... लंबा सा चेहरा..... लम्बी उंगलियाँ........मजबूत कलाई .....जम्बो के नाम से मशहुर कुंबले अब कभी नही दिखेंगे सफ़ेद भारतीय जर्सी में । शांत स्वभाव वाले कुंबले क्रिकेट के पुराने पीढी के कुछ आखरी कड़ी थे। उनके खेल जीवन की तुलना किसी और खिलाड़ी से करना क्रिकेट की तौहीन होगी। कुम्बेल का सन्यास क्रिकेट की दुनिया से किसी संत का सन्यास है । कुंबले हमेशा याद रखे जायेंग कई सफलताओं के कारण॥

कुमार सम्भव

Wednesday, October 15, 2008

मुलाकात पुण्य प्रसून बाजपेई के साथ
वैसे पुण्य प्रसून बाजपेई जी से मिलना आप में से बहुतों के लिए साधारण बात है। लेकिन मेरे जेसे नए पत्रकार के लिए बड़ी बात है। मेरे बात चीत का मज्मू कुछ इस प्रकार है।

प्रश्न: सर मुझे काम चाहिय। कोलकाता से सहारा समय के लिए काम कर चुका हूँ। लेकिन दिल्ली में नौकरी की तलाश में भटक रहा हूँ। कई जगह प्रयास किया कोई जवाब नही मिला। यही समझ में आया की God Father जरूरी है। इसलिए आप के पास आया हूँ।

बाजपेई : सम्भव नौकरी करना चहाते हो या पत्रकारिता। अगर नौकरी चाहिए तो ग़लत जगह आऐ हो चैनल में नौकरी संपादक नही HR देता है। और वो देखता है कि Cost to Company कितना आएगा, Product जो मै दूंगा उसका इस्तेमाल company कर पायेगी कि नही। एसे में सम्भव तुमसे जायदा फायेदा company को राजू श्रीवास्तव देगा।

Monday, October 13, 2008

यशवंत जी की भड़ास

पिछले कुछ दिनों से भड़ास पर धर्म-अधर्म, सीता-राम, दशरथ की चर्चा जोरों पर हैं। एक दुसरे को जम कर गली दी जा रही है। तर्क वितर्क दिए जा रहे हैं। मेरा सभी से ये पूछना है की क्या इस तरह की बहस जरुरी है? मै न आस्तिक हूँ न नास्तिक मै राम को भी मानता हूँ और रहीम इशु सभी के लिए इज्जत रखता हूँ। मैं जनता हूँ की कुछ भडासी भाई मुझे safe zone में जाने का आरोप लगा सकते है कुछ मुझे चुतिया और कायर कहेंगे लेकिन जो मुझे जानते है उनके लिए ये मानना कठिन नही है।
मै धर्म की इस लडाई पर इतना ही कहूँगा की धर्म सदा से पर्सनल चीज रही है और उसे सड़क पर ले के नही आना चाहिय। मुर्ख इस पर बहस करते हैं ? और मेरे भडासी भाईयों कई मुद्दें हैं उठाने को। अब समय आगया है की हम आगे बढ़ें और सार्थक बहस का हिस्सा बने।
जय भडासी
Kumar sambhav

Thursday, August 21, 2008

पत्रकारिता झारखण्ड में

गए हफ्ते झारखण्ड सुर्खियों में रहा। खबरिया चैनल के सारे पत्रकार अचानक व्यस्त हो गए। किसी-किसी चैनल के रिपोर्टर २५-२५ फोनों करते पाए गए। चलिए अच्छा लगा कुछ तो हो रहा है । लेकिन ख़बर कुछ और है । ख़बर लेने के पीछे जो गला काट प्रतियोगिता हुई वो बड़ा मजेदार रहा। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के पत्रकार के बीच हाथा पाई तक की नौबत आगई। कुछ लोग अपने फोनों में शिबू सोरेन को गुरूजी कह कर संबोधित कर रहे थे । जहाँ तक मेरी समझ है पत्रकारिता में किसी को विशेषण से संबोधित नही करनी चाहिये । कुछ लोंगो को तो झारखण्ड विधान सभा की सीटों की गिनती नही पता है वो यहाँ एक राष्ट्रीय चैनल के व्यूरो हेड हैं । उदहारण तो कई हैं। सोचने वाली बात है की लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ किनके कर कमलों में है??
दुष्यंतजी के शब्दों में :
जितना सोचा था ज्यादा निकला
जिसकी उठाई पूँछ वो मादा निकला
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